Tuesday, January 26, 2010
 भुजंगासन 
इस आसन में शरीर की आकृति फन उठाए हुए भुजंग अर्थात सर्प जैसी बनती है इसीलिए इसको भुजंगासन या सर्पासन कहा जाता है।

विधि : उल्टे होकर पेट के बल लेट जाए। ऐड़ी-पंजे मिले हुए रखें। ठोड़ी फर्श पर रखी हुई। कोहनियाँ कमर से लगी हुई और हथेलियाँ ऊपर की ओर अब धीरे-धीरे हाथ को कोहनियों से मोड़ते हुए लाए और हथेलियों को बाजूओं के नीचे रख दें। फिर ठोड़ी को गरदन में दबाते हुए  माथा भूमि पर रखे। पुन: नाक को हल्का-सा भूमि पर स्पर्श करते हुए सिर को आकाश की ओर उठाए। जितना सिर और छाती को पीछे ले जा सकते है ले जाए किंतु नाभि भूमि से लगी रहे।
20 सेकंड तक यह स्थिति रखें या अपनी शरीर की  क्षमतानुसार  ! श्वांस हमेशा सामान्य रखते हैं बाद में श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे सिर को नीचे लाकर माथा भूमि पर रखें। छाती भी भूमि पर रखें। पुन: ठोड़ी को भूमि पर रखें। धीरे- धीरे इसका समय बढ़ा कर 3 मिनट 48 सेकेण्ड तक कर लें। 

सावधानी : इस आसन को करते समय अकस्मात् पीछे की तरफ बहुत अधिक न झुकें। इससे आपकी छाती या पीठ की माँस-‍पेशियों में खिंचाव आ सकता है तथा बाँहों और कंधों की पेशियों में भी बल पड़ सकता है जिससे दर्द पैदा होने की संभावना बढ़ती है। पेट में कोई रोग या पीठ में अत्यधिक दर्द हो तो यह आसन न करें।





इसके लाभ :भुजंगासन के अभ्यास से भोजन का न पचना ,गैस ,एसिडिटी तथा पाचन संस्थान को मजबूत करने के लिए यह अदित्तीय आसन हैं !इस आसन से रीढ़ की हड्डी सशक्त होती है। और पीठ में लचीलापन आता है। यह आसन फेफड़ों की शुद्धि के लिए भी बहुत अच्छा है और जिन लोगों का गला खराब रहने की, दमे की, पुरानी खाँसी अथवा फेंफड़ों संबंधी अन्य कोई बीमारी हो, उनको यह आसन करना चाहिए।
इस आसन से पित्ताशय की क्रियाशीलता बढ़ती है और पाचन-प्रणाली की कोमल पेशियाँ मजबूत बनती है। इससे पेट की चर्बी घटाने में भी मदद मिलती है और आयु बढ़ने के कारण से पेट के नीचे के हिस्से की पेशियों को ढीला होने से रोकने में सहायता मिलती है।
इससे बाजुओं में शक्ति मिलती है। पीठ में स्थित इड़ा और पिंगला नाडि़यों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। विशेषकर, मस्तिष्क से निकलने वाले ज्ञानतंतु बलवान बनते है। पीठ की हड्डियों में रहने वाली तमाम खराबियाँ दूर होती है। कब्ज दूर होता है।


                                                                डॉ. एस.एल. यादव         
                                                                                    मुख्य चिकित्सक 
                                                                सेंटर फॉर नेचुरोपैथी एंड योग टेक्नोलाँजी 
                                                                                    आई. आई. टी. कानपुर  
Friday, January 22, 2010


Type Questions here:

Saturday, January 9, 2010
                                                                           हमारे उत्पाद 
अम्रत पेय 
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आयुवर्धक योग (शक्ति एवं रक्तवर्धक )
मधुमेह नाशक आयुवर्धक योग 
आलस्य ,कमजोरी ,शरीर में दर्द व थकावट नाशक 
आयुवर्धक योग स्त्रियों हेतु (श्वेत प्रदर मासिक सम्बन्धी दोषों हेतु )
आयुवर्धक योग (याददास्त, कम,आलस्य ,कमजोरी ,सिरदर्द  )
आयुवर्धक योग 
Monday, January 4, 2010
                पैरों पर एक सरसरी नजर डालकर उनकी व बॉडी की सेहत के बारे में काफी कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। जानते हैं, कैसे..
.            हो सकता है, कि शुरुआत में आपको यह एक मजाक लगे, लेकिन यह सच है, कि पैरों से किसी व्यक्ति की सेहत का काफी हद तक अंदाजा लगाया जा सकता है। डॉक्टर्स का कहना है कि,  पैरों के चेकअप के जरिए डायबिटीज से लेकर न्यूट्रिशनल कमी तक का पता लगाया जा सकता है। 

     नाखूनों पर निशान  
          
    नाखूनों को लेकर आने वाली कोई समस्या अक्सर शरीर में किसी कमी की निशानी होती है। नाखूनों पर सफेद निशान होने का मतलब है कि आपके शरीर में आयरन की कमी है या आपको एनीमिया है। ऐसे में नाखूनों की शेप भी बिगड़ जाती है, जो हीमोग्लोबिन की कमी के चलते होता है। ऐसे में नाखून आसानी से टूटने लगते हैं और पैर ठंडे पड़ जाते हैं। थकान महसूस होना, बहुत नींद आना और सिर दर्द वगैरह अनीमिया के कुछ और लक्षण हैं।

     पैरों का फटना
                सही तरह एक्सर्साइज न करने या शरीर में पानी की कमी की वजह से पैर फटते हैं। अगर ऐसा बार-बार होता है, तो इसका मतलब है कि आपकी डाइट में कैल्शियम, पोटाशियम व मैग्निशियम की कमी है। प्रेग्नेंट महिलाओं में ऐसा अक्सर दिखता!

     पैर की चोट का ठीक न होना                                                                                  
                  ऐसा डायबिटीज की वजह से होता है। खून में ग्लूकोज के ज्यादा होने की वजह से पैरों की नर्व्स डैमिज हो जाती हैं, जिस वजह से छोटी-मोटी चोटों व कट्स का पता नहीं चलता। अपने पैरों को ध्यान देखें और किसी भी तरह के कट को नजरअंदाज न करें। डायबिटीज के अन्य लक्षण लगातार प्यास लगना, बार-बार यूरिन जाना, थकान, बहुत भूख लगना और वजन का कम होना वगैरह हैं।

      पैर ठंडे रहना
                 यह शिकायत महिलाओं में खासी कॉमन है और यह थायरॉड प्रॉब्लम का इशारा भी हो सकती है। महिलाओं का बॉडी टेम्परेचर पुरुषों की तुलना में थोड़ा कम होता है, जिस वजह से वे इस समस्या की जल्द शिकार बन जाती हैं। 40 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं में ठंडे पैर होने का मतलब थायरॉड ग्लैंड का कम ऐक्टिव होना है। बता दें कि यह ग्लैंड बॉडी के टेम्परेचर व मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करता है। 

     मोटे व पीले नाखून
                 यह सही है कि उम्र के साथ नाखूनों का रंग बदलता है, लेकिन यह फंगल इंफेक्शन और बिना केयर वाले नाखूनों की निशानी भी है। पैरों में फंगल इंफेक्शन बिना कोई परेशानी से लंबे समय तक पनप सकती है। बाद में नाखूनों में से खराब स्मेल आने लगती है और इनकी रंगत काली होती जाती है।

     बड़े अंगूठे का बड़ा होना
            यह अक्सर गाउट की निशानी है, जो आर्थराइटिस का ही एक टाइप है। यह शरीर में यूरिक एसिड ज्यादा होने की वजह से होता है। शरीर में जमने वाला यूरिक एसिड सुई के आकार व साइज के क्रिस्टल्स में बनता है। 40 व 50 की पार के पुरुष इससे ज्यादा परेशान होते देखे गए हैं।

     पैरों का सुन्न पड़ना
             अगर आप अपने पैर को महसूस नहीं कर पा रहे हैं या उसमें सुइयां चुभने जैसा कुछ अहसास होता है, तो यह पेरिफेरल नर्वस सिस्टम डैमिज होने की निशानी हो सकता है। ऐसा डायबिटीज और अल्कोहल के ज्यादा पीने की वजह से हो सकता है।

     रूखी त्वचा
            त्वचा के रूखे होने को हल्के तौर पर न लें। रूखी और जलन वाली त्वचा कुछ समय में एथलीट फुट जैसी फंगल इंफेक्शन में बदल सकती है। आगे चलकर इससे इंफ्लेमेशन व ब्लिस्टर्स तक हो सकते हैं। 

                                                भारतीय योग शास्‍त्र      

योग शब्द का अर्थ है जुडना, यदि इस शब्द को आध्यात्मिक अर्थ मे लेते है तो इस का तात्पर्य आत्मा का परमात्मा से मिलन और दोनो का एकाग्र हो जाना है। भक्त का भगवान से, मानव का ईश्वर से, व्यष्टि का समष्टि से, पिण्ड का ब्रह्मण्ड से मिलन को ही योग कहा गया है, हकीकत मे देखा जाए तो यौगिक क्रियाओ का उद्देश्य मन को पूर्ण रुप से प्रभु के चरणो मे समर्पित कर देना है । ईश्वर अपने आप मे अविनाशी और परम शक्तिशाली है। जब मानव उस के चरणो मे एकलय हो जात है तो उसे असीम सिद्धि दाता से कुछ अंश प्राप्त हो जाता है, उसी को योग कहते हैं।

चित वृतियों पर नियंत्रण और उस का विरोध ही दर्शन शास्त्र में योग शब्द से विभूषित हुआ है। जब ऎसा हो जाता है और ऎसा होने पर उस व्यक्ति को भूत और भविष्य आंकने मे किसी प्रकार की कोई परेशानी नही होती, वह अपने संकेत से ब्रह्मण्ड को चलायमान कर सकता है।
भारतीय योग शास्त्र मे इसके पांच भेद बताए गए हैं-

  1. हठ योग
  2. ध्यान योग
  3. कर्म योग
  4. भक्ति योग
  5. ज्ञान योग
मूलत: मनुष्य मे पांच मुख्य शक्तियां होती है उन शक्तियों के अधार पर ही योग के उपर लिखे भेद या विभाजन संभव हो सका है। प्राण शक्ति का हठ योग से, मन शक्ति का ध्यान योग से, क्रिया  शक्ति का कर्म योग से, भावना शक्ति का भक्ति योग से, बुद्धि शक्ति का ज्ञान योग से पूर्णत: सम्बन्ध है । वर्तमान काल मे इस विष्य पर जो ग्रन्थ प्राप्त होते है उन मे हठ योग प्रदीपिका, योग दर्शन, गोरख संहिता, हठ योग सार, तथा कुण्ड्क योग प्रसिद्ध हैं। पतांजलि का योग दर्शन इस सम्बन्ध मे प्रमाणिक ग्रन्थ माना गया है।

महार्षि पतांजलि ने चित की वृतियों का विरोध योग के माध्यम से बताया है और उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं, जो कि निम्नलिखित हैं
१ यम    २  नियम     ३  आसन    ४  प्रणाय़ाम    ५  प्रत्याहार    ६  धारणा    ७ ध्यान  
८ और समाधि



ऊपर जो आठ अंग बताए गए हैं उनमे से प्रथम पांच अंग बाहरी तथा अन्तिम तीन अंग भीतरी या मानसी कहे गए हैं।
  1. यम:- अहिंसा, सत्य,अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह का व्रत पालन ही 'यम' कहा जाता है।
  2. नियम:- स्वाध्याय, सन्तोष, तप, पवित्रता, और ईश्वर के प्रति चिन्तन को' नियम' कहा जाता है।
  3. आसन:- सुविधापूर्वक एक चित और स्थिर होकर बैठने को आसन कहा जात है।
  4. प्राणायाम:- श्‍वास और नि:श्‍वास की गति को नियंत्रण कर रोकने व निकालने की क्रिया को प्राणायाम कहा जाता है।
  5. प्रत्याहार:- इन्द्रियों को अपने भौतिक विषयों से हटाकर चित मे रम जाने की क्रिया को प्रत्याहार कहा जाता है।
जब यह पांच कर्त्तव्य सिद्ध हो जातें हैं या इनमे से जब कोई साधक पूर्णता प्राप्त कर लेता है तभी उसे योग के आगे की क्रियायों मे प्रवेश की अनुमति दी जाती है। प्रत्येक साधक को चाहिए कि वह बाह्य अभ्यासों को सिद्ध करने के बाद ही आगे के तीन अभ्यासों मे प्रवेश करें तभी उसे आगे के जीवन मे पूर्णता प्राप्त हो सकती है।
  1. धारण:- चित्त को किसी एक विचार मे बांध लेने की क्रिया को धारण या धारणा कहा जाता है।
  2. ध्यान:- जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहां से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।
  3. समाधी:- ध्येय वस्तु के ध्यान मे जब साधक पूरी तरह से डूब जाता है और उसे अपने अस्तित्व  का ज्ञान नही रहता है तो उसे समाधी कहा जाता है। 
Sunday, January 3, 2010
              आमतौर पर यह धारणा प्रचलित है कि संभोग के अनेक आसन होते हैं। 'आसन' कहने से हमेशा योग के आसन ही माने जाते रहे हैं।  जबकि संभोग के सभी आसनों का योग के आसनों से कोई संबंध नहीं। लेकिन यह भी सच है योग के आसनों के अभ्यास से संभोग के आसनों को करने में सहजता पाई जा सकती है।

योग के आसन : योग के आसनों को हम पाँच भागों में बाँट सकते हैं:-
1  पहले प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने और चलने-फिरने के ढंग के आधार पर बनाए गए हैं
 जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर,शलभ , मत्स्य, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक आदि।    
2. दूसरी तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि।
3. तीसरी तरह के आसन वनस्पतियों और वृक्षों पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन आदि।
4. चौथी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले माने जाते हैं-जैसे शीर्षासन, एकपादग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन आदि।
5. पाँचवीं तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी के नाम पर आधारित हैं-जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन आदि
                       यहाँ आसनों के नाम लिखने का आशय यह कि योग के आसनों और संभोग के आसनों के संबंध में भ्रम की निष्पत्ति हो ! संभोग के उक्त आसनों में पारंगत होने के लिए योगासन आपकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए आपको शुरुआत करना चाहिए 'अंग संचालन' से अर्थात सूक्ष्म व्यायाम से। इसके बाद निम्नलिखित आसन करें: -

                 आमतौर पर यह धारणा प्रचलित है कि संभोग के अनेक आसन होते हैं। 'आसन' कहने से हमेशा योग के आसन ही माने जाते रहे हैं। जबकि संभोग के सभी आसनों का योग के आसनों से कोई संबंध नहीं। लेकिन यह भी सच है योग के आसनों के अभ्यास से संभोग के आसनों को करने में सहजता पाई जा सकती है।

योग के आसन : योग के आसनों को हम पाँच भागों में बाँट सकते हैं:-
1. पहले प्रकार के वे आसन जो पशु-पक्षियों के उठने-बैठने और चलने-फिरने के ढंग के आधार पर बनाए गए हैं जैसे- वृश्चिक, भुंग, मयूर, 
         शलभ, मत्स्य, सिंह, बक, कुक्कुट, मकर, हंस, काक आदि।
2. दूसरी तरह के आसन जो विशेष वस्तुओं के अंतर्गत आते हैं जैसे- हल, धनुष, चक्र, वज्र, शिला, नौका आदि।
3. तीसरी तरह के आसन वनस्पतियों और वृक्षों पर आधारित हैं जैसे- वृक्षासन, पद्मासन, लतासन, ताड़ासन आदि।
4. चौथी तरह के आसन विशेष अंगों को पुष्ट करने वाले माने जाते हैं-जैसे शीर्षासन, एकपादग्रीवासन, हस्तपादासन, सर्वांगासन आदि।
5. पाँचवीं तरह के वे आसन हैं जो किसी योगी के नाम पर आधारित हैं-जैसे महावीरासन, ध्रुवासन, मत्स्येंद्रासन, अर्धमत्स्येंद्रासन आदि

                    यहाँ आसनों के नाम लिखने का आशय यह कि योग के आसनों और संभोग के आसनों के संबंध में भ्रम की निष्पत्ति हो।संभोग के उक्त आसनों में पारंगत होने के लिए योगासन आपकी मदद कर सकते हैं। इसके लिए आपको शुरुआत करना चाहिए 'अंग संचालन' से अर्थात सूक्ष्म व्यायाम से। इसके बाद निम्नलिखित आसन करें:- 
                                                    कामसूत्र और योगासन


(1) पद्‍मासन : इस आसन से कूल्हों के जाइंट, माँसमेशियाँ, पेट, मूत्राशय और घुटनों में खिंचाव होता है जिससे इनमें मजबूती आती है और यह सेहतमंद बने रहते हैं। इस मजबूती के कारण उत्तेजना का संचार होता है। उत्तेजना के संचार से आनंद की दीर्घता बढ़ती है।

(2) भुजंगासन : भुजंगासन आपकी छाती को चौड़ा और मजबूत बनाता है। मेरुदंड और पीठ दर्द संबंधी समस्याओं को दूर करने में फायदेमंद है। यह स्वप्नदोष को दूर करने में भी लाभदायक है। इस आसन के लगातार अभ्यास से वीर्य की दुर्बलता समाप्त होती है।

(3) सर्वांगासन : यह आपके कंधे और गर्दन के हिस्से को मजबूत बनाता है। यह नपुंसकता, निराशा, यौन शक्ति और यौन अंगों के विभिन्न अन्य दोष की कमी को भी दूर करता है।

(4) हलासन : यौन ऊर्जा को बढ़ाने के लिए इस आसन का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पुरुषों और महिलाओं की यौन ग्रंथियों को मजबूत और सक्रिय बनाता है।

(5) धनुरासन : यह कामेच्छा जाग्रत करने और संभोग क्रिया की अवधि बढ़ाने में सहायक है। पुरुषों के ‍वीर्य के पतलेपन को दूर करता है। लिंग और योनि को शक्ति प्रदान करता है।

(6) पश्चिमोत्तनासन : सेक्स से जुड़ी समस्त समस्या को दूर करने में सहायक है। जैसे कि स्वप्नदोष, नपुंसकता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दोषों को दूर करता है।

(7) भद्रासन : भद्रासन के नियमित अभ्यास से रति सुख में धैर्य और एकाग्रता की शक्ति बढ़ती है। यह आसन पुरुषों और महिलाओं के स्नायु तंत्र और रक्तवह-तन्त्र को मजबूत करता है।

(8) मुद्रासन : मुद्रासन तनाव को दूर करता है। महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े हए विकारों को दूर करने के अलावा यह आसन रक्तस्रावरोधक भी है। मूत्राशय से जुड़ी विसंगतियों को भी दूर करता है।

(9) मयुरासन : पुरुषों में वीर्य और शुक्राणुओं में वृद्धि होती है। महिलाओं के मासिक धर्म के विकारों को सही करता है। लगातार एक माह तक यह आसन करने के बाद आप पूर्ण संभोग सुख की प्राप्ति कर सकते हो।

(10) कटी चक्रासन : यह कमर, पेट, कूल्हे, मेरुदंड तथा जंघाओं को सुधारता है। इससे गर्दन और कमर में लाभ मिलता है। यह आसन गर्दन को सुडौल बनाकर कमर की चर्बी घटाता है। शारीरिक थकावट तथा मानसिक तनाव दूर करता है।
Saturday, January 2, 2010
  
योग क्या है?
योग शब्द के दो अर्थ हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। पहला है- जोड़ और दूसरा है समाधि। जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ते, समाधि तक पहुँचना कठिन होगा योग दर्शन या धर्म नहीं, गणित से कुछ ज्यादा है। दो में दो मिलाओ चार ही आएँगे। चाहे विश्वास करो या मत करो, सिर्फ करके देख लो। आग में हाथ डालने से हाथ जलेंगे ही, यह विश्वास का मामला नहीं है।

योग है विज्ञान : 'योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है-राजपथ। दरअसल धर्म लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है।'-ओशो

जैसे बाहरी विज्ञान की दुनिया में आइंस्टीन का नाम सर्वोपरि है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन हैं पतंजलि। जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है, वैसे ही समस्त दर्शनों, विधियों, नीतियों, नियमों, धर्मों और व्यवस्थाओं में योग श्रेष्ठ है।

Wednesday, December 30, 2009
                                                                               गोरा बनें -मुहांसे हटाए सौन्दर्य बढ़ाए 
सौन्दर्यवर्धक पाउडर-प्रदूषण,खान पान
Monday, December 14, 2009
१)  हरीरा पाउडर-(कोलाइटिस की दवा ) पके बेल ,ईसबगोल की भूसी और सौंठ के योग से बनी यह दिव्य औषधि कोलाइटिस के पुराने से पुराने रोग को समूल नष्ट करती हैं !बार-बार दस्त आना,आँव आना,मरोड़,पतले झागदार दस्त,कीचड़ जैसे दस्त की समस्या को दूर करने हेतु रामबाण औषधि हैं !
२) उदर शोधक चूर्ण- (पेट तथा आँतो को साफ करने की दवा ) यह हानि रहित,आदत न डालने वाली अद्वितीय कल्याणकारी प्रद औषधि हैं !जो हर घर परिवार के लिए आवश्यक हैं !यह चूर्ण पुराने से पुराने कष्टकारी कब्ज,आँतो में फसे हुए मल को बाहर लाने,गैस,आँव,एसिडिटी बवासीर के रोगी को तुरन्त लाभ देकर ताजगी,स्फूर्ति प्रदान करके रोग मुक्त प्रदान करने का एक मात्र प्राकृतिक औषधि हैं ! 
३) अर्जुनत्वक चूर्ण- (हृदय रोगियों के लिए )हृदय रोगियों के लिए ,उच्चरक्तचाप,घबराहट,हृदय की कमजोरी,साँसफूलना व दिल की धड़कन का तेज होना आदि रोगों के निदान में हजारो बर्षो से सुप्रसिध्द गुणकारी व श्रेष्ठ औषधि हैं !
४) अमृत पेय-  प्रकृति की गोद में स्वास्थ्य के लिय सर्दी,जुकाम,खाँसी,लगातार छीके आना,कफ की सिकायत होना,मानसिक तनाव,भारीपन,चिडचिडापन,गुस्सा, जल्दी-जल्दी बुखार आना, कमजोरी लगना किसी काम में मन न लगना,दिन में भी सोने की इच्छा होना,शरीर में अकडन, दर्द,आलसपन,तुरन्त नष्ट करने वाली हैं !शरीर को स्वस्थ सबल निरोगी रखने के लिय अनोखी क्षमता इस पेय में हैं!   
Monday, November 23, 2009
                ३)  आसनों  की शास्त्रोक्त ब्याख्या 
    योगशास्त्रो में आसन चौरासी लाख बताये गये हैं उसमे  भी प्रमुख चौरासी हजार हैं !चौरासी हजार आसनों में भी प्रधान चौरासी सौ हैं !उसमे प्रमुख चौरासी हैं !इन चौरासी आसनों में भी प्रमुख ३२ हैं और इन बत्तीस आसनों में भी प्रमुख ११ ,९ या ८ आसन हैं !इसमे प्रमुख चार आसन हैं ,इन चार में  भी प्रमुख दो आसन बताये गये हैं ,और इन दो आसनों में भी एक आसन प्रमुख हैं !चौरासी लाख आसन तो साक्षात् शंकर जी ही जानते हैं ,जिनसे योग की उत्पत्ति हुई हैं !साधानातया प्रचलित आसन १०८ या ३२ हैं !इन चौरासी आसनों में भी जो प्रधान ३२ आसन हैं उनके बारे में घेरंड ऋषी ने कुछ इस प्रकार कहा हैं -                                      आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तव!
            चतुशीतिलक्षाणि शिवेन कथितं पुरा !!१!!
            तेषां मद्ये विशिष्टानि षोड़शोनं शतं कृतम!
            तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिशंदासनं शुभम!!२!!
 अर्थात इस प्रथ्वी पर जितने जीवजन्तु हैं ,उतने ही प्रकार के आसन हैं !शास्त्रकारो ने चौरासी लाख योनियाँ बताई हैं !इन चौरासी लाख योनियों के आधार पर ही शंकर भगवान ने चौरासी लाख आसनों को बताया हैं !उसमे से चौरासी सौ मुख्य हैं और उसमे से चौरासी आसन मुख्य बताये गये हैं और उसमे से जो बत्तीस आसन प्रमुख बताये गये हैं वे इस प्रकार हैं :       
            अर्थात १ सिध्दासन,२ पदमासन,३ भद्रासन, ४मुक्तासन ,५ बज्रासन ,६ स्वस्तिकासन ,७ सिंहासन ,८ गोमुखासन,९वीरासन ,१० धनुरासन ,१० मृतासन ,११ गुप्तासन ,१२ मत्स्यासन ,१४ मत्स्येन्द्रासन ,१५ गोरक्षासन ,१६ पश्चिमोत्तान,१७ उत्कटान,१८संकटान,१९ मयूरासन,२० कुक्कुटासन ,२१ कूर्मासन,२२ उत्तानकूर्मासन,२३ उत्तानमंडूकासन,२४ वृक्षासन,२५ मण्डूकासन,२६ गरुड़ासन,२७ ब्रिषभासन,२८ शलभासन ,२९ मकरासन ,३० उष्ट्रासन ,३१ भुजंगासन और३२ योगासन !ये बत्तीस आसन मनुष्य लोक के लिए सिद्धि देने वाले हैं !इन बत्तीस आसनों में भी मुख्य रूप से ११ आसन बताये गये हैं !उनका विधान गोरक्षनाथ जी के शिष्य स्वात्माराम जी हठयोग-प्रदीपिका में इस प्रकार लिखते हैं :


    १ सिद्धासन ,२ पदमासन ,३ गोमुखासन ,४ वीरासन ,५ कुक्कुटासन ,६ उत्तानकूर्मासन,७ धनुरासन ,८ मत्स्येन्द्रासन ,९ पश्चिमोत्तानासन , १०मयूरासन ,और  ११शवासन !योगतत्वोपनिषत में कहा गया हैं कि प्रमुख आसन चार हैं :-
        सिद्धं पदमं तथा सिंहं भद्रं च तच्च्त  !(योगतत्तोपनिषद)    
        अर्थात सिध्दासन ,पदमासन ,सिंहासन और भद्रासन!
योगकुन्दल्लूपनिषत में इन मुख्य चार आसनों में भी प्रमुख दो आसन बताये गये हैं :-आसनं द्विविधं प्रोक्तं पदमं वज्रासनं तथा !
(योगकुन्दल्लूपनिषत)       
         अर्थात ये दो आसन पदमासन और बज्रासन हैं !बज्रासन का मतलब यहाँ सिध्दासन से हैं !योगी लोग सिध्दासन को बज्रासन के नाम से पुकारते हैं !आमतौर से यह नाम ऊँचे योगियों में प्रचलित हैं !


       योगकुन्दल्लूपनिषत में  भी उपर्युक्त श्लोक की पूर्ति के लिए लिखा हैं :-
         एकं सिध्दासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम !
         शटचक्र षोडशाधारं त्रिलक्ष्य व्योमपंचकम !!३!!
         स्वदेहे यो न जानाति तस्य सिध्दि कथं भवेत !!४!                                           (योगचडामणयुपनिषद)                     अर्थात सिध्दासन ,कमलासन ,छः चक्र ,सोलह आधार ,तीन लक्ष्य और पाँच प्रकार के आकाश (घटाकाश ,मठाकाश,महाकाश ,चिदाकाश ,और परमाकाश) जो शारीर में बिध्दमान हैं ,इनको जो  नहीं जानता उसे सिध्दि कैसे मिल सकती हैं!
यहाँ पर पदमासन को कमलासन बताया गया हैं !
उसी प्रकार से योगचडामणयुपनिषद में सिध्दिआसन को वज्रासन कहा गया हैं!  
  योगशास्त्रों में सिध्दि आसन को वज्रासन और पदमासन को कमलासन के नाम से पुकारा  हैं गया हैं !इस लिए साधक लोग भ्रम में ण पड़े !इन दो आसनों में भी एक  प्रमुख आसन माना गया हैं !वह चौरासी लाख आसनों का राजा हैं !हठयोग -प्रदीपिका में इसके लिए बताया गया हैं :-
   नासनं सिध्दसदृशं न कुम्भः केवलोपम: !                              न खेचरी-समा मुद्रा न नाद्सदृशो(हठयोग -प्रदीपिका)
 अर्थात सिध्दासन के समान कोई आसन नही हैं !केवल कुम्भक के सामान कोई कुम्भक नही हैं ! खेचरी के सामान कोई मुद्रा नहीं हैं ,और नाद के सामान मन को लय करने वाली कोई चीज नहीं हैं योगशास्त्रों में योग की चरम सीमा पर पहुँचने के लिए या शरीर को निरोग यवं स्वस्थ बनाने के लिए आसनों को इतना महत्व दिया गया हैं की इन्हे छोड़कर न हम रोग दूर कर सकते हैं और न स्वस्थ लाभ कर सकते हैं !बिना आसन के योग में जो सबसे महत्व की चीज समाधि बताई गई हैं उसे भी प्राप्त नही कर सकते !जाबालदर्शनोंपनिषत में बताया गया हैं कि:-
   आसनं विजितं येन जितं तेंन जगत्रयम !!
   अनेन विधिना युक्ता प्राणायामं सदा कुरू !!                                    (जाबालदर्शनोंपनिषत)
अर्थात जिसने आसन को जीत लिया हैं उसने तीनो लोको को जीत लिया हैं १एसि प्रकार बिधि-विधान से प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए !तीन घंटा अड़तालिस मिनट एक आसन पर बैठने से आसन सिध्दि हो जाता हैं हठयोग-प्रदीपिका में कहा गया हैं कि :-
     अथासने दृणे योगी वशी हितमिताशनः !!
     गुरूपदिष्टमार्गेण प्राणामान्समभ्यसेत  (हठयोग-प्रदीपिका )
  अर्थात निश्चल सुखपूर्वक बैठने का नाम आसन हैं!इसका यह तात्पर्य हैं कि साधक आसन की सिध्दि को प्राप्त करे !अर्थात जब आसन की सिध्दि हो जाती हैं तब साधक निश्चल भाव से बिना हिले डुले सुख-पूर्वक अर्थात बिना कुछ कष्ट अनुभव किये ही बहुत समय तक जिस आसन पर बैठकर आसानी से योग का अभ्यास कर सके उसे ही "स्थिरसुखमासनम" कहते हैं !उपर्युक्त आसन
की पुष्टि की लिए महर्षि पतंजलि ने अपने अगले सूत्र में इस प्रकार कहा हैं !
          प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम !!                                     ( " पातज्जलयोगदर्शन")
अर्थात प्रयत्न की शिथिलता से और अनन्त में मन लगाने से आसन सिध्द होता हैं !जब आसन की पूर्ण-रूपेण सिध्दि हो जाती हैं ,तब उस योगी की सम्पूर्ण बाह्य चेष्टा  स्वतः ही शिथिल अर्थात धीरे धीरे समाप्त हो जाती हैं !यह भी पूर्ब सूत्र के आशय का प्रतिपादन करता हैं !यह सूत्र आसन के द्वारा अर्थात आसन की सिध्दि होने पर समाधि तक पहुंचाने का संकेत करता हैं!क्यों कि महर्षि पतंजलि ने अगले सूत्र में इसे स्पष्ट किया हैं :-                                                        ततो द्वान्द्वान्भिघातः !                                            ("पातज्जलयोगदर्शन")
अर्थात इस आसन की सिध्दि से शीत,उष्ण आदि द्वन्दों का नहीं लगता अर्थात आसन सिध्दि हो जाने से शरीर पर सर्दी गर्मी आदि द्वन्दों का प्रभाव नहीं पड़ता !इसका तात्पर्य यह हैं कि शरीर में इन सभी द्वन्दों को सहने की शक्ति प्राप्त हो जाती हैं !क्यों कि यही बाह्य द्वंद्व चित्त को चंचल करके साधन में बिघ्न डालकर मन को भी चंचल करता हैं इन सभी तीनो सूत्रों का तात्पर्य यह हैं कि आसन कि सिध्दि होने पर ही योगी समाधि को प्राप्त करता हैं !
 योगी चरणदास जी ने बताया हैं कि :                                      आसन प्राणायाम करि, पवन पंथ गहि लेही !
     षट चक्कर को भेद करि ,ध्यान शून्य मन देहि !!(भक्ति सागर)
   अर्थात आसन और प्राणायाम करके पवन के मार्ग को वश में कर लेना चाहिए और षट चक्र को भेदन करके मन को शून्य में लगा देना चाहिए !गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को योग का आदेश देते हुए योगी पुरुष को किस प्रकार योग के द्वारा अपने मन को वश में करना चाहिए यह कहा हैं -
        योगी युंजीत सततमात्मानं रहसि स्थितः !
        एकाकी यत-चित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः!! ( भगवद गीता )      
अर्थात योगारूढ़ पुरुष आशओं और परिग्रह को छोड़कर शरीर और चित्त दोनों को स्वाधीन करके एकांत में अकेला होकर सदा मन को एकाग्र करे !आगे और भी बताया गया हैं!


           

                         डॉ. एस.एल. यादव  
                                           मुख्य चिकित्सक 
                     सेंटर फॉर नेचुरोपैथी एंड योग टेक्नोलाँजी 
                                       आई. आई. टी. कानपुर  
Sunday, November 22, 2009
१)    यम-      पाँच  सामाजिक नैतिकता !                 
       यम पाँच हैं -  १. अहिंसा  २. सत्य  ३. आस्तेय  ४. ब्रम्हचर्य ५ अपरिग्रह                                                 
       अहिंसा -  शब्दों   से ,विचरों से और  कर्मो से किसी को हानि न पहुँचाना ! 
       सत्य  -     विचरों में सत्यता ,परम सत्य में स्थित रहना !
       आस्तेय-   चोर प्रब्रृति का न होना !                                                                         
       ब्रम्हचर्य -   इसके दो अर्थ हैं  !                   
                                          *चेतना को ब्रम्हा  के ज्ञान  मे  स्थिर  करना   !                
                                           *सभी इंद्रिय -जनित सुखो में संयम बरतना  !
अपरिग्रह -  आवश्यकता से अधिक धन का संचय न करना और दूसरो की बस्तुओ की इच्छा न करना!  

२)         नियम- पाँच व्यक्तिगत नैतिकता !                                                                                                                                                 नियम भी पाँच हैं १.  शौच  २. संतोष  ३. तप  ४. स्वाध्याय  ५. ईश्वर प्रादिधान 
       शौच -  शरीर-और मन की  शुद्धि!
       संतोष- संतुष्ट  और प्रसन्न रहना !
       तप-      स्वयं में अनुशासित रहना !  
       स्वाध्याय -आत्मचिंतन करना !
       ईश्वर प्रादिधान-ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ,पूर्ण श्रद्धा !

३)  आसन   
योगशास्त्रो में आसन चौरासी लाख बताये गये हैं उसमे  भी प्रमुख चौरासी हजार हैं !चौरासी हजार आसनों में भी प्रधान चौरासी सौ हैं !उसमे प्रमुख चौरासी हैं !इन चौरासी आसनों में भी प्रमुख ३२ हैं और इन बत्तीस आसनों में भी प्रमुख ११ ,९ या ८ आसन हैं !इसमे प्रमुख चार आसन हैं ,इन चार में  भी प्रमुख दो आसन बताये गये हैं ,और इन दो आसनों में भी एक आसन प्रमुख हैं !चौरासी लाख आसन तो साक्षात् शंकर जी ही जानते हैं ,जिनसे योग की उत्पत्ति हुई हैं !साधानातया प्रचलित आसन १०८ या ३२ हैं !इन चौरासी आसनों में भी जो प्रधान ३२ आसन हैं उनके बारे में घेरंड ऋषी ने कुछ इस प्रकार कहा हैं -           
४)  प्राणायाम 
५)  प्रत्याहार 
 ६)  धारणा      
७)   ध्यान       
८)   समाधि    


बिधि -सिंहासन करने के लिए सबसे पहिले खड़े होकर दोनों एडियो को  मिलकर दोनों पैर  के पंजे खोल देते है फिर एडियों को उठाकर 
पंजे के सहारे एडियों  पर बाथ  

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